सहजन का पेड़ एक बहुउपयोगी और औषधीय गुणों

सहजन की जड़, जिसे अंग्रेजी में ड्रमस्टिक ट्री (Drumstick Tree) या मोरिंगा (Moringa Oleifera) कहा जाता है, सहजन के पेड़ का एक हिस्सा है। सहजन...

सहजन की जड़, जिसे अंग्रेजी में ड्रमस्टिक ट्री (Drumstick Tree) या मोरिंगा (Moringa Oleifera) कहा जाता है, सहजन के पेड़ का एक हिस्सा है। सहजन का पेड़ एक बहुउपयोगी और औषधीय गुणों से भरपूर पेड़ माना जाता है।
सहजन की जड़ के बारे में मुख्य बातें

  यह सहजन के पेड़ का निचला हिस्सा है जो जमीन के अंदर होता है।
 सहजन के पेड़ के लगभग सभी हिस्से (पत्तियां, फूल, फलियाँ/फली, छाल और जड़) औषधीय और पोषक गुणों से भरपूर होते हैं।

  आयुर्वेद में सहजन की जड़ का उपयोग कई रोगों के उपचार के लिए किया जाता है।

  सहजन की जड़ का उपयोग दमा, पथरी, जलोदर (Ascites), प्लीहा रोग (Spleen disease) आदि में लाभकारी माना जाता है।

 इसकी जड़ की छाल का काढ़ा सेंधा नमक और हींग के साथ पीने से मिर्गी के दौरे और पित्ताशय की पथरी में लाभ होने की बात कही जाती है।

यह पेड़ भारतीय उपमहाद्वीप का देशज है और इसे मुनगा, सेंजन, सुजना आदि नामों से भी जाना जाता है।

सहजन की जड़ की छाल का काढ़ा बनाने की एक सामान्य विधि:

सहजन की जड़ की औषधि मुख्य रूप से काढ़ा (Decoction) या छाल का लेप/काढ़ा के रूप में बनाई जाती है।

यह विधि अक्सर मिर्गी के दौरे या पित्ताशय की पथरी जैसी समस्याओं के लिए बताई जाती है, लेकिन किसी भी बीमारी के लिए इसका उपयोग करने से पहले हमेशा किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लेना बहुत ज़रूरी है।

सामग्री:- सहजन की जड़ की छाल: लगभग 10 से 20 ग्राम (ताज़ी या सूखी)।

पानी:- लगभग 400 मिलीलीटर (या 2 कप)।
सेंधा नमक (Rock Salt): स्वादानुसार या चुटकी भर।
हींग (Asafoetida): एक चुटकी (बहुत थोड़ी मात्रा)।


बनाने की विधि:-छाल तैयार करें: सहजन की जड़ को अच्छी तरह धो लें। फिर उसकी बाहरी छाल को सावधानी से निकाल लें। यदि सूखी छाल का उपयोग कर रहे हैं, तो उसे मोटा-मोटा कूट लें।

उबालना:- एक बर्तन में पानी और सहजन की जड़ की छाल डालें।

काढ़ा बनाना:- इस मिश्रण को धीमी आंच पर तब तक उबालें जब तक कि पानी घटकर लगभग एक चौथाई (लगभग 100 मिलीलीटर) न रह जाए।

छानना:- इस उबले हुए मिश्रण को छान लें।

मिलाना:- इस छने हुए काढ़े में एक चुटकी सेंधा नमक और एक चुटकी हींग मिलाएं।

सेवन:- इसे गुनगुना होने पर पी सकते हैं|

अन्य उपयोग (बाहरी):-

गठिया (अर्थराइटिस) या मोच के लिए: सहजन की जड़ की छाल को पीसकर लेप (पेस्ट) बनाकर सरसों के तेल में हल्का गर्म करके प्रभावित स्थान पर लगाने से आराम मिलने की बात कही जाती है| 

महत्वपूर्ण चेतावनी और सलाह:

किसी भी प्रकार की हर्बल या आयुर्वेदिक औषधि का सेवन करने से पहले, उसकी मात्रा (Dose), सेवन का समय और सही रोग निदान के लिए हमेशा एक योग्य और अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श लें। अपनी मर्जी से किसी भी औषधि का सेवन शुरू न करें| 


पित्ताशय की पथरी (Gallbladder Stones) के लिए

सहजन (मोरिंगा) की जड़ का उपयोग पथरी (Stones) की समस्या में भी किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, सहजन की जड़ और फली दोनों ही पथरी में लाभकारी हो सकती हैं।

यहाँ पथरी के प्रकार के अनुसार इसके उपयोग की जानकारी दी गई है:

पित्ताशय की पथरी (Gallbladder Stones) के लिए
आयुर्वेदिक मतों के अनुसार, सहजन की जड़ की छाल का काढ़ा पित्ताशय की पथरी में लाभप्रद हो सकता है।

  विधि:- सहजन की जड़ की छाल लें। इसका काढ़ा पिछली बार बताई गई विधि के अनुसार तैयार करें (पानी में उबालकर एक चौथाई कर लें)। छानने के बाद, इस काढ़े में सेंधा नमक और हींग मिलाकर सेवन करें।

 उद्देश्य:- माना जाता है कि यह पित्ताशय के कार्य को ठीक करने और पथरी को निकालने में मदद करता है।

गुर्दे और मूत्राशय की पथरी (Kidney and Bladder Stones) के लिए

सहजन की जड़ की छाल का काढ़ा गुर्दे की पथरी के लिए भी सुझाया जाता है।

 जड़ की छाल का काढ़ा:- कुछ आयुर्वेदिक ग्रंथों में बताया गया है कि सहजन की जड़ की छाल के काढ़े को दिन में 3 बार पिलाने से गुर्दे की पथरी चूर-चूर होकर निकल सकती है।

  सहजन की फली:- सहजन की सब्जी (फली) को नियमित खाने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी कटकर निकल जाने की बात भी कही जाती है।
अत्यंत महत्वपूर्ण चेतावनी:- पथरी एक गंभीर चिकित्सीय स्थिति है। इसका उपचार हमेशा किसी योग्य डॉक्टर (Urologist या Gastroenterologist) या अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में ही किया जाना चाहिए।
 
 पित्ताशय की पथरी के मामले में, घरेलू उपचार या हर्बल दवाएँ लेने से पहले विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि इसमें रुकावट आने पर स्थिति गंभीर हो सकती है।
 

उपयोग की सही मात्रा और अवधि जानने के लिए चिकित्सक से परामर्श लें। खुद से दवा शुरू करना खतरनाक हो सकता है।


मेरा उपयोग:-सहजन के जड़ को उबालकर अच्छे से छान ले या साजन जड़ को पानी में उबलने जब पानी में उबलते समय आधा रहे जाए तब पानी को झनकार, गुनगुने पानी पी जाए , आपकी पथरी जल्द से जल्द ठीक हो जाएंगी



सहजन की जड़ (Moringa Root) के औषधीय उपयोग पथरी के अलावा भी बहुत व्यापक हैं, खासकर आयुर्वेद में इसे एक शक्तिशाली औषधि माना गया है। सहजन की जड़ के कुछ प्रमुख कार्य और उपयोग निम्नलिखित हैं:-
1. वात और कफ रोगों में (Vata and Kapha Disorders)

सहजन की जड़ को वात और कफ दोषों को शांत करने में प्रभावी माना जाता है।
 गठिया और सियाटिका (Sciatica):- इसकी छाल का काढ़ा गठिया (जोड़ों के दर्द) और सियाटिका (पैर में तेज दर्द) के उपचार में श्रेयस्कर माना जाता है।

 पैरालिसिस/लकवा (Paralysis):- परंपरागत रूप से जड़ का उपयोग लकवे के उपचार में भी किया जाता है।

श्वसन तंत्र के लिए (Respiratory System)

  दमा (Asthma):- सहजन की जड़, विशेषकर इसकी छाल का उपयोग दमा (अस्थमा) के प्रबंधन में किया जाता है।


   माना जाता है कि यह फेफड़ों के लिए टॉनिक के रूप में काम करती है और कफ को बाहर निकालने में मदद करती है।


पाचन और पेट के रोग (Digestion and Abdominal Disorders)

  प्लीहा रोग (Spleen Disease):- जड़ का उपयोग प्लीहा (Spleen) के रोगों के उपचार में होता है।

 जलोदर (Ascites/Dropsy):- जलोदर (पेट में असामान्य रूप से पानी जमा होना) की समस्या में भी इसका उपयोग होता है।

 पेट के कृमि (Intestinal Worms):- हालांकि मुख्य रूप से पत्तियों का रस उपयोग होता है, जड़ के तत्वों को भी कृमियों को नष्ट करने में सहायक माना जाता है।

तंत्रिका तंत्र के रोग (Nervous System Disorders)
 मिर्गी (Epilepsy):- सहजन की जड़ की छाल का काढ़ा सेंधा नमक और हींग के साथ पीने से मिर्गी के दौरों में लाभ होने की बात कही जाती है।

त्वचा रोग और बाहरी उपयोग (Skin and Topical Uses)
  फोड़े (Abscesses):- सहजन की जड़ की छाल को पीसकर लेप (पेस्ट) लगाने से फोड़े ठीक होते हैं और उन्हें पककर फूटने में मदद मिलती है।

 दर्द और सूजन (Pain and Inflammation):- इसकी छाल का लेप या काढ़ा बाहरी सूजन और दर्द को कम करने के लिए भी उपयोग किया जाता है।

6. सिर दर्द (Headache) :- सहजन की जड़ के रस में गुड़ मिलाकर छानकर, इसे नाक में 1-1 बूंद डालने से सिर दर्द में लाभ होने की पारंपरिक मान्यता है।

नोट:-
सहजन की जड़ की प्रकृति तीव्र (तेज) और गर्म मानी जाती है। इसलिए, इसका उपयोग हमेशा चिकित्सक की सलाह और सही मात्रा (Dosage) के अनुसार ही करना चाहिए। जड़ का अधिक मात्रा में या गलत तरीके से सेवन हानिकारक हो सकता है।


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